पश्चिम बंगाल के चुनावी बिसात (West Bengal Elections) म ए दरी जे मोहरा मन चले जावत हे, ओखर सुवाद ह अब्बड़ चुरपुर अउ नुनछुर हे। राजनीति के गली-खोर म विकास अउ रोजगार के आंकड़ा ले जादा गोहार 'झालमुड़ी' (Jhalmuri) अउ 'मछरी-भात' (Fish-Rice) के सुने बर मिलत हाबे। येला देख के अलकरहा घलोक लगथे कि जेन देस म महंगाई अउ बेरोजगारी के गंभीर मुद्दा ऊपर गोठ होना चाही, उहां के जनता अउ न्यूज़ चैनल मन एक ठन नास्ता अउ जेवन के थारी ऊपर घंटों बहस करत हें। असल में, बंगाल के राजनीति में जेवन ह सिरिफ पेट भरे के साधन नो हे, बल्कि ये ह एक बड़का 'सांस्कृतिक चिन्हारी' (Cultural Identity) बन चुके हे, जेला अब राजनीतिक दल मन भुनाये के कोसित करत हावय।
सोशल मीडिया (Social Media) के दौर में 'झालमुड़ी' ह अब सिरिफ एक ठन सस्ता नास्ता नइ रहिगे, बल्कि ये ह नेता मन बर 'आम आदमी' (Common Man) वाले रूप बनाय के सबले बड़का हथियार बन गे हे। हाले में झाड़ग्राम में अचानक एक ठन दुकान में रुक के झालमुड़ी के सुवाद लेवइया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) ह सोशल मीडिया में वीडियो डार के एला एक ठन 'जरूरी ब्रेक' बताइस। ओखर ये काम ऊपर ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) ह करारा हमला करत एला 'चुनावी नौटंकी' (Electoral Drama) कहिस। मुख्यमंत्री ह एक रैली में कहिस, "जब चुनाव आथे, तब ए मन ला झालमुड़ी सुरता आथे, बाकी बखत ए मन बंगाल के संस्कृति के अपमान करथें।" सादगी के ये दिखावा डिजिटल दुनिया में अतका तेजी ले वायरल (Viral) होथे कि असली मुद्दा मन पाछू छूट जाथें।
उही कोती 'मछरी-भात' के मुद्दा ह अउ जादा अचरज भरे अउ हंसे के बात लगथे। भाजपा के बड़े-बड़े नेता मन बंगाल जाके ओमन ला रिझाय बर मछरी-भात खावत दिखत हें। प्रधानमंत्री मोदी ह एक ठी रैली में सरकार ला घेरत कहिस, "बंगाल ह मछरी उत्पादन में आत्मनिर्भर (Self-reliant) काबर नई हे? टीएमसी के नीति के सेती मछरी ह बाहिर ले मंगाए बर पड़त हे।" एकर जवाब में ममता बनर्जी ह भाजपा ऊपर 'जेवन के राजनीति' (Food Politics) करे के आरोप लगावत कहिस, "भाजपा राज वाले राज्य में ए मन मछरी-मांस खाय ऊपर रोक लगाथें अउ इहाँ आ के दिखावा करथें।" ये बात ह तब अउ जादा गजब लगथे जब वो नेता मन जे मन आन राज्य में शाकाहार के उपदेश देथें, वो मन इहाँ टीका लगा के मछरी के सुवाद लेवत हें।
ए बोलीठोली (Political Satire) के लड़ई में कांग्रेस के हाल घलो कम नई हे। राहुल गांधी (Rahul Gandhi) ह बंगाल के ए 'जेवन वाले लड़ाई' (Food War) ऊपर गोठियावत कहिस कि भाजपा अउ टीएमसी दूनों ह असली मुद्दा ले जनता के धियान भटकावत हें। ओ मन कहिन, "बंगाल ला कारखाना अउ नौकरी के जरूरत हे, फेर इहाँ के राजनीति ह सिरिफ खाय के थारी अउ ध्रुवीकरण (Polarization) में सिमट गे हे।" अचरज के बात ये हे कि न्यूज़ चैनल मन घलो ए 'फूड पॉलिटिक्स' ला एक बड़ तमाशा बना डारे हें। घंटों ए बात ऊपर चर्चा होथे कि कोन नेता ह मछरी ला कइसे खाइस या झालमुड़ी में मिर्चा ह कतका चुरपुर राहिस। ये आज के जुग के कड़वा सच हे कि मनोरंजन अउ राजनीति के बीच के लकीर ह अब मिट गे हे।
कोलकाता के कॉलेज स्ट्रीट ले लेके गाँव के चौपाल तक आम जनता के कहना हे कि बाहिर ले आय नेता मन के झालमुड़ी खाना या मछरी-भात के फोटो खिंचाना ह वोट पाय के एक तरीका भर आय, एकर ले जनता के समस्या के हल नइ होवय। जनता के एक बड़े हिस्सा दबे जुबान में ये घलो कहिथे कि "पेट ह सिरिफ मछरी-भात अउ झालमुड़ी ले नहीं, बल्कि रोजगार (Employment) ले भरही।" मनखे मन बर ये दुख के बेरा हे कि जे बंगाल ह देस ला बड़े-बड़े बिचारक अउ क्रांतिकारी दिस, आज ओ बंगाल के चुनावी चर्चा ह सिरिफ 'थारी के सुवाद' तक रहिगे हे। जनता ए तमाशा ला देखत त हे, फेर वो ह ये घलो जानथे कि कैमरा हटते साठ ये सुवाद ह गायब हो जाही अउ पाछू रही जाही पाँच साल के उही जुन्ना चुनौती।
असल किबे त, ये 'गजब के देस' (Incredible Country) के 'गजब के राजनीति' आय। जिहाँ चुनाव अब सिरिफ नीति के लड़ाई नो हे, बल्कि चिन्हारी के जुध बन गे हे। भाजपा जिहाँ 'मछरी' के संग अपन जगा बनाय के कोसित करत हे, उहें टीएमसी एला 'बंगाली अस्मिता' (Bengali Pride) ऊपर खतरा बतावत हे। जनता ला ये बात समझे बर परही कि चुनावी सीजन में जेन ये चटपटा सुवाद मिलत हे, वो ह कहुं आने वाले दिन के कड़वा सच ला छुपाय बर त नइ परोसे जावत हे। खैर, जब तक चुनाव चलही, बंगाल के हवा में राजनीति के संग-संग ए जेवन-पान के सोर घलो गूंजत रही, फेर असली सवाल मन ह ओइसने के ओइसने खड़े रही।
एक सवाल:
"तुमन ला का लगथे, का जेवन-पान के गोठ ले जनता के असली समस्या मन ह दूर हो जाही? अपन बिचार कमेंट म जरूर बताओ।"


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