होली विशेष: सियान मनके के अनुभव ले दूर होइस होली के भरम, 3 मार्च के जलही होली, 4 के मनाबो तिहार

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होली विशेष: सियान मनके के अनुभव ले दूर होइस होली के भरम, 3 मार्च के जलही होली, 4 के मनाबो तिहार


छत्तीसगढ़/अंचल: येसो के साल होली के तारीख मन ल लेके मचे ऊहापोह अउ पंचांग के मतभेद के बीच गाँव के सियान मन अपन अनुभवी राय ले एक बड़का फइसला हरे हें। जिहाँ कुछ पंचांग मन 2 मार्च के आधा रात होलिका दहन के गोठ कहत हें, उहिँचे गांव के बुजुर्ग अउ सियान मन साफ कहिदे हें कि "होलिका दहन के ठीक दूसर दिन धुलेंडी (तिहार) मनाय के हमर जुन्ना पुरखा मन के परंपरा ल नइ तोड़े जाही।" सियान मन के मुताबिक, 3 मार्च के होलिका दहन अउ 4 मार्च के रंग के तिहार मनाना ही सही अउ शास्त्र सम्मत हे।

काबर 2 मार्च के बदला 3 मार्च के होही दहन?
गाँव के सियान मन के कहना हे कि 2 मार्च के भद्रा के भारी साया हे अउ सास्तर में भद्रा काल में होलिका दहन ल सुभ नइ माने जाय। सयाना मन कहिथें- "हमन अपन पुरखा मन ले सीखे हन कि होली अउ धुलेंडी के बीच 'अंतराल' नइ राखे जाय। अगर हमन 2 मार्च के आधा रात के दहन करबो अउ 3 तारीख ल सूतक या दूसर कारन ले खाली छोड़ देबो, त ये तिहार के नियम अउ हमर माटी के परंपरा के खिलाफ होही।" अगर 2 मार्च के होलिका दहन होही, त 3 मार्च के धुलेंडी मनाना पड़ही।

चंद्र ग्रहण अउ सूतक के समाधान 🌑✨

3 मार्च के लगने वाला चंद्र ग्रहण ल लेके सियान मन के कहना हे कि ग्रहण के मोक्ष (सिराय) संझा के ही हो जाही। ग्रहण के सुद्धिकरण के बाद, पवित्र मूहूर्त में होलिका दहन करना सबले सुभ हे। एकर ले न केवल ग्रहण के दोष मिटही, बल्कि पूरा गाँव में सुख-समृद्धि घलो आही।

परंपरा के सार्थकता: "होलिका के राख ले ही सुरु होथे धुलेंडी"

छत्तीसगढ़ी संस्कृति अउ ग्रामीण परंपरा में होलिका दहन के राख के बड़े महत्व हे। बिहनिया होलिका के ठंडी राख ल माथा में लगा के ही धुलेंडी के सुरुवात करे जाथे। सियान मन के अनुभव कहिथे कि:-
  • 3 मार्च (मंगलवार): संझा के चंद्र ग्रहण के बाद सुद्धिकरण करके पूरे विधि-विधान ले होलिका दहन करे जाही।
  • 4 मार्च (बुधवार): दूसर दिन बिहनिया परंपरा के मुताबिक धुलेंडी अउ रंग-गुलाल के तिहार मनाय जाही।

एकजुटता के संदेस

गाँव-गाँव के गुड़ी मन में ये गोठ-बात आम हे कि तिहार तारीख के गिनती ले जादा "सामूहिक आस्था अउ परंपरा" के विषय आय। सियान मन अपील करे हें कि लोगन मन सोशल मीडिया में फैलत भरम में झन आवय। 2 मार्च के बाद 3 मार्च के 'गैप' रखना उचित नइ हे। हमन अपन परंपरा नइ तोड़न अउ दहन के दूसर दिन ही खुसी के रंग खेलबो।

सार गोठ: सियान मन के अनुभव अउ पारंपरिक कैलेंडर के हिसाब ले, ये साल 3 मार्च के होलिका दहन अउ 4 मार्च के धुलेंडी के महापर्व पूरा उल्लास के साथ मनाय जाही।

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