होली म माई-लोगन अऊ कोरा म लइका के मूरत जलाना: समाज के कुरुपता या परंपरा?

अंजोर
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होली म माई-लोगन अऊ कोरा म लइका के मूरत जलाना: समाज के कुरुपता या परंपरा?


होली के तिहार हमर छत्तीसगढ़ अऊ भारतीय संस्कृति म 'अधर्म के ऊपर धरम के जीत' के खुसी के रूप म मनाय जाथे। पहिली के समय म, ये तिहार ह गांव के चउक-चंउराहा म लकड़ी अऊ छेना के ढेर जलाके, सबो ​झिन मिल-जुल के खुसी बांटे अऊ मन के बैर-भाव ल भुलाये एक सुग्घर माध्यम रिहिस। गांव के सियान अऊ लइका मन ए दिन रिस-गुस्सा ल तियाग के रंग-गुलाल खेलय अऊ सबो झिन मिल के तिहार के मान बढ़ावय। फेर, बीते कुछ बछर मन म ए परंपरा ह अइसन रूप धर ले हे, जेला देख के कोनो भी संवेदनील मनखे ह बिचलित हो सकथे। आजकल गांव-गांव म चउक म एक चिता बनाके ओमा एक माई-लोगन अऊ ओकर कोरा म बइठे मासूम लइका के मूरत बनाके आगी लगा दे जाथे, जेला देखना बहुतेच पीरा दायक हे।

ए दृश्य के पीछे भक्त प्रहलाद अऊ होलिका के पौराणिक कथा के तर्क दिये जाथे, जिहां होलिका ह अपन भतीजा प्रहलाद ल कोरा म लेके आगी म बइठ गे रिहिस। भले ही कथा के मतलब बुराई के अंत ल दिखाना आय, फेर आज के पढ़े-लिखे अऊ सभ्य समाज म एक जलत हुए चिता म माई-लोगन अऊ लइका के मूरत भबक भबक के जलत देखना अऊ ओकर ऊपर खुसी मनाना, अपन आप म एक बड़े सोच-बिचार के बिसय हे। कोनो भी जुन्ना कथा के संदर्भ ल आज के सामाजिक स्थिति अऊ मनखे के भावना म बिना सोचे-समझे जस के तस लागू करना उचित नइ लागय। आज के समाज ह देख के अऊ चिन्हा मन ले सीखथे, अऊ जब ए चिन्हा ह अतका डरावना होही, त ओकर संदेस घलो खराब ही जाही।

अइसन समाज म, जिहां हमन माई-लोगन मन के सम्मान, सुरक्षा अऊ लइका मन के मानसिक विकास के गोठ करथन, ओती सरेआम एक तिरिया के मूरत अऊ ओकर कोरा म बइठे लइका के पुतला ल जलाना एक उलटा संदेस देथे। एला देखइया छोटे लइका अऊ दाई-बहिनी मन के मन म का असर परत होही, ये सोचे के बात हे। कोनो जलत हुए माई-लोगन अऊ ओकर कोरा म लइका के दृश्य, चाहे वो माटी या पैरा-काड़ी के ही काबर झन हो, मनखे के दया-माया ल खतम कर सकथे। ये ह अनजाने म समाज ल हिंसा देख के डरे के बजाए ओकर प्रति अनसुना बना देथे, जेकर से भविष्य म खराब असर पर सकथे।

जुन्ना कथा मन के अपन एक आध्यात्मिक अऊ चिन्हारी के महत्व होथे, फेर ओ चिन्हा मन ल भौतिक रूप म हिंसा के तरीका ले दिखाना जरूरी नइ हे। समय के मांग हे कि हमन तिहार के असली मतलब ल समझन अऊ ओला आज के मनखे मूल्य के हिसाब ले ढालन। तिहार के अर्थ ह मया-पिरीत, भाईचारा अऊ सुग्घर विचार के फइलाव होना चाही। यदि कोनो काम ले हमर भीतर म दया के जगा घिन या डर पैदा होथे, त ओ परंपरा के स्वरूप म सुधार करना बहुत जरूरी हे। बुराई के अंत ह विचार ले होना चाही, न कि कोनो मूरत ल वीभत्स तरीका ले जला के दिखाना चाही।

आखिर म, समाज ह आगू बढ़े के नाम आय अऊ यदि कोनो प्रथा हमर भावना ल चोट पहुँचाथे, त ओमा सुधार करना ही सबले बड़े बुद्धिमानी आय। होलिका दहन के असली मतलब हमर भीतर छिपे जलन, गुस्सा अऊ घमंड अइसन राक्षस वाले गुन मन के नाश होना चाही। हमन ल अपन तिहार मन ल अऊ जादा दयालु, संस्कारी अऊ सुग्घर बनाय बर सबो झिन ल मिल के कदम उठाना चाही। आघू अवइया पीढ़ी ह तिहार मन ले हिंसा अऊ डरइया दृश्य झिन सीखय, बल्कि मानवता, सुरक्षा अऊ एक-दूसर के सम्मान करना सीखय, तभे ए तिहार के असली जीत होही।

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