छत्तीसगढ़ महतारी के कोरा म कतको कलाकार जनम लीन, कतको नाच-गाना अउ सुआ-करमा के कलाकार मन अपन जिनगी खपा दीन, फेर अइसन 'कलाकार' आज तक नइ देखिन जइसन हमर संस्कृति विभाग के 'बड़े साहब' हावय। साहब करा अइसन कउन 'जड़ी-बूटी' या 'मोहनी' हे, येला खोजे बर अब बइगा-गुनिया धरे के जरूरत परत हावय।
कांग्रेस के राज रिहिस त साहब के 'गमछा' के रंग दूसरा रिहिस, अउ अइसे चउखट म भाजपा के चरन पड़िस, साहब ह 'केसरिया' रंग अइसन ओढ़ लीन मानो जनम-जनम के संघी आय। कतको मनखे आय अउ गीन, पर साहब ह 'अंगद के पांव' बरोबर जमे हावय। चाहे पंजा के राज राहय या कमल के, साहब बर 'संस्कृति' के मतलब सिरिफ अपन 'कुर्सी' ल बचाना आय।
साहब ल छत्तीसगढ़ी माटी के महक ले थोरकुन एलर्जी हे। ओमन ल बस्तर के ढोल अउ मैदानी इलाका के ददरिया ले जादा 'मुंबईया तड़का' सुहाथे। हमर सुग्घर कलाकार मन जब अपन लोक के परंपरा ल लेके साहब करा जाथे, त साहब के चश्मा ह 'धुंधला' हो जाथे। ओमन ल स्थानीय कलाकार मन 'फूटे आंखी नइ सुहावय'। ओकर नजर म कलाकार वो आय जेकर इंस्टाग्राम म 'ब्लू टिक' हे, हमर 'माटी पुत्र' मन तो बिचारा सिरिफ भीड़-भाड़ बढ़ाय बर हंवय।
साहब के राज म छत्तीसगढ़ी संस्कृति ह अब खेत-खलिहान ले निकल के 'एसी' कमरा अउ 'फाइव स्टार' होटल म सिमट गे हे। जेला छत्तीसगढ़ी के 'छ' घलो नइ आवय, ओला बड़े-बड़े आयोजन के जिम्मा मिलथे। अउ हमर असली कलाकार? ओमन तो आज घलो 'मानदेय' के फार्म भरत-भरत चप्पल घिस डारत हंवय।
सत्ता के गलियारा म गोठ चलथे कि साहब करा कोनो अइसन 'गुप्त मंत्र' हे कि जेकर सरकार आथे, ओला साहब ह ये भरोसा दिला देथे कि- "मोर बिना छत्तीसगढ़ के संस्कृति ह अनाथ हो जाही।" अब ये 'मोहनी' नइ ओ त अउ का आय? जेकर आए ले स्थानीय कलाकार मन के 'गत' नइ रिहिस, ओला आज घलो 'फूल भरोसा' के साथ पद म रखे गे हे।
धन्य हे साहब अउ धन्य हे वो 'कुर्सी'। छत्तीसगढ़ी कलाकार मन तो बेचारा भोला-भाला हंवय, ओमन ल का पता कि 'संस्कृति' के असली कला त 'कुर्सी' म चिपके रहे म हावय। साहेब ल सादर नमन, काबर कि ओमन ह प्रमाणित कर दीन कि- "सरकार ह आही-जाही, पर मैं अमर हंव।"


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