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समर्थ रचनाकार के समर्थ कृति "अमृतध्वनि" : पुस्तक समीक्षा | समीक्षक- अजय अमृतांशु, भाटापारा



बोधनराम निषाद जी ये कृति ल पढ़त पढ़त मनीराम मितान के कृति "महापरसाद" के सुरता आ गे। छत्तीसगढ़ के लोक जीवन ल मनीराम जी जतका करीब ले छुये हे वइसने "अमृतध्वनि" मा लोक जीवन के नंदावत संस्कृति अउ जिनिस मन ला सहेजे के सुग्घर काम निषाद जी करे हवय। देश के कोनो भी आँचलिक भाखा म निमगा "अमृतध्वनि" छन्द म रचे ये पहला कृति आय जेखर बर कवि ला अन्तस् ले बधाई। 

अमृतध्वनि छन्द मा लेखन आसान काम नोहय। येला मँय सवैया सरिक थोरिक कठिन विधा मानथंव । एक दोहा के उपरांत रोला खंड में 8,8,8 मात्रा म यति सहित यमक ला झमकाना कोनो समर्थ रचनाकार ही कर सकत हे। विविध विषय ला ले के ये कृति मा कुल 174 "अमृतध्वनि" समाहित हवय। लोक परब अउ लोक संस्कृति म- भोजली,कमरछठ,तीजा, पोरा,मातर, सकरायत, देवारी, होली, गौरी गौरा,मातर, मड़ई, छेरछेरा,जेठउनी,भोजली, सकरायत, राम नवमी, माघी पुन्नी,अक्ति 

आदि ल विषय बना के छन्द रचे गे हवय।उँहे ये संग्रह के माध्यम ले निषाद जी मन छत्तीसगढ़ के लोक जीवन के नँदावत जिनिस मन ला अमृतध्वनि छंद मा सहेज के नवा पीढ़ी ल बताए के सुग्घर उदीम करे हवय। ढेकी, गोरसी, ढेरा, ढेलवा, खरही, कोला बारी, बटलोही,जाँता, रहचुली, बिजना,कुंदरा, खरहेरा, मूसर,बाहना,पैरा, घानी, निसैनी, टेड़ा, गेंड़ी,गेरवा, बरदी आदि के सुग्घर चित्रण ये संग्रह म मिलथे जेला पढ़ के सरलता से ये जिनिस के बारे मा जाने जा सकत हे। 

एक अमृतध्वनि म 32 प्रकार के रुख राई के चित्रण करना कोनो मामूली बात नोहय ये निषाद जी छंद कौशल ही आय कि बड़ सहजता ले चित्रण कर देथे अउ पाठक ल आनंद के अनुभूति भी होथे- 

औंरा साजा बेहरा, चिरई जाम खम्हार।
सलिहा सरई सेनहा, बीजा तेंदू चार।।
बीजा तेंदू, चार आम अउ, तिलसा कर्रा।
मउहा कउहा, भिरहा बोइर, डूमर हर्रा।।
मूढ़ी मोंदे, कलमी परसा, सेम्हर धौंरा।
बेल मकइया, गस्ती कैथा, बम्हरी औंरा।।       

कोनो भी काव्य मा यदि संदेश नइ हे ता लेखन अधूरा ही माने जाही। निषाद जी समाज ल सुग्घर संदेश देहे के काम अपन काव्य मा करे हवय। पर्यावरण संतुलन,सामाजिक समरसता, नशा उन्मूलन, नैतिक शिक्षा, नारी महिमा आदि ला अपन छन्द म समेटे हवय । संदेश के एक बानगी देखव- 

कतको तीरथ घूम लव, काशी हरि के द्वार।
गंगा जमुना डूब लव, पी लौ अमरित धार।।
पी लौ अमरित, धार अबिरथा, नइ हे सेवा।
मात-पिता के, सेवा कर लव,  पाहू मेवा।।
इँखर चरण मा, जम्मो देबी, झन तुम भटको।
पा लव दरसन, इहाँ बसे हे, तीरथ कतको।।

डोंगरी के जीव जन्तु के सुन्दर चित्रण अमृतध्वनि छ्न्द मा देखव- 

लिलवा बिज्जू कोटरी, बरहा खरहा शेर।
खेखर्री हुँड़रा सबो, घूमँय संझा बेर।।
घूमँय संझा, बेर कोलिहा, माँचाडेवा।
गवर रेड़वा, साम्हर चीतर, सब जी लेवा।।
भलुवा भइँसा, हरिन कोटरी, हाथी पिलवा।
साई कुकरी, सोन कुकुर अउ, मंजूर लिलवा।।
इहाँ आप ध्यान देहू कवि जानवर मन बर उही शब्द के प्रयोग करे हावय जेन आम बोलचाल म गाँव के मनखे मन करथे। 

विगत 4-5 बछर म छत्तीसगढ़ म छंदकार मन के नवा पीढ़ी तैयार होय हवय। ये कृति ल पढ़े के बाद  सुखद अहसास होइस कि अब छत्तीसगढ़ी साहित्य हा पोठ होवत हे। छत्तीसगढ़ी मा छन्द के दशा मजबूत हवय अउ उचित दिशा म सुग्घर काम होवत हे। अनुस्वार, अनुनासिक अउ उत्तम तुकांत के प्रयोग ये किताब के महत्ता ला दर्शाथे।  

छत्तीसगढ़ के लोक जीवन अउ संस्कृति ल परिचित कराय मा कवि पूर्णतः सफल होय हवय। आशा करथंव कि अपन अवइया कृति म निषाद जी वर्तमान के ज्वलंत समस्या उपर अपन कलम 
चलाही अउ छत्तीसगढ़ म नवा क्रांति के संचार करही। छत्तीसगढ़ी भाखा ल पोठ करे खातिर बोधनराम निषाद जी ला अन्तस् ले बधाई।

कृति  -  अमृतध्वनि
सुकवि - बोधनराम निषाद
मूल्य -   150/- 
समीक्षक- अजय अमृतांशु, भाटापारा

2 टिप्‍पणियां:

जोहार पहुना, मया राखे रहिबे...

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