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लक्ष्मीनारायण ‘फरार’ के आलेख : आस के महीना असाढ़

आस के महीना असाढ़


असाढ़ के महीना ल सिरतोन म आस के महीना माने जाथे। काबर के बइसाख अउ जेठ के गरमी दिन भर झांझ  झोल चीलछीलावत घाम अउ भुइयां के भोभरा, सरसरावत तात-तात हवा के झाकोरा ले मन अऊ तन उकता जाथे। सुरूज देवता घलो अपन परभाव ले आगी बरसात रथे। अइसे गरमी ले  मनखे मन हलकन तो होथेच अउ सगे-संग संसार के जम्मो जीव के जिनगी रहन-सहन आवा जाही अपरमपार हो जाथे। अइसे म नवा जिनगी अउ नवा उमंग उल्लास अउ आस  लेके आथे असाढ़। जम्मो जीव अउ मनखे मन ल पानी के आस रथे। पानी हे त जिनगानी हे। झीमीर-झीमीर पानी गिरे ले पियासे भुइयां के पियास ह बुझाथे। झमाझम बरसा बरसथे अगास म बादर छाये रथे। चारो खूठ धरती मइया हरियर अचरा अओढ़ के  जन मानस अउ जीव जगत ल नवा सक्ति के  संचार के नेवता देथे। नान्हेय बड़े पौधा म नवा-नवा कली ले फूल फूले ल धरथे रुख रई घलो झूमर-झूमर के नाचे लगथे डबरी-डबरा नदिया तरीया पानी के आस म सुखाय परे रही थे। उख़रो आस  असाढ़ के बाट जोहत रहिथे। जम्मो खेत खार हरियर हो जाथे। 
आस के महीना असाढ़ के अगोरा जम्मो चराचर ल रहिथे। फेर हमर भुइयां के भगवान अन्न के उपजइया किसान भाई मन ल बढ़ आसा रहिथे। जेखर ले उखर खेती-किसानी ख़ातिर भारी महतम के महीना असाढ़ ल मानथे अउ असाढ़ ले  धान के बावत के सीरी गनेस करथे। खेतिहर मजदूर मन नागर बइला लेके खेत खार डहर जाथे लोगन मन कहिथे सुरू भला त  अंत भला। किसान भाई मन इही असाढ़ महीना ले फसल सोला आना होही के अंकाल परही इहू  भविष्य के अनुमान लगा लेथे। इही ख़ातिर सिरतोन म आस के महीना असाढ़ ल माने जाथे।

- लक्ष्मीनारायण फरार 
मठपारा, रायपुर [9827809099]

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