छत्तीसगढ़ के परयाग कहे जाने वाला राजिम के पावन धरती म होवइया 'राजिम कुंभ कल्प' ए दारी अपन असली रूप ले भटकगे हे। सासन-परसासन ह एला दुनिया भर म बड़े देखावा बर 'कुंभ' के नाव त देदे हे, फेर जमीनी सच ह "नाम बड़े अउ दरसन छोटे" वाला कहावत ला सच कर देवत हे। अचरज के बात हे कि जेला पांचवा कुंभ कहिके परचारित करे गिस, ओ ह अब सिरिफ कागज अउ विज्ञापन मन म भव्य दिखत हे। छत्तीसगढ़ बने के 25 साल बाद घलो, सुसासन के दावा के बीच ए मेला ह अव्यवस्था के सेती लोगन अउ सरधालु मन बर चिंता के बिसय बनगे हे।
ए आयोजन के सबले दुख भरे बात कलाकार अउ दरसक मन के बीच के दूरी आय। एक कोती हमर छत्तीसगढ़ी संस्कृति ला बचइया कलाकार मन ला बखत म जेवन अउ मंच तक पहुंचे बर घलो जूझना पड़त हे, त दूसर कोती बड़े-बड़े बैरिकेड लगा के दरसक मन ला कलाकार मन ले दूर कर दे गे हे। सुरक्षा के नाव म आम जनता ला अतका दूर रख दे गे हे कि मंच के परस्तुति अउ देखइया मन के बीच के सुघ्घर गोठ-बात ह सिराय बरोबर हे। कलाकार मन ला देखइया कमती होगे हें, जेकर ले ओ मन के उत्साह घलो कम होवत हे, ए ह हमर छत्तीसगढ़ी कला के अपमान आय।
अध्यात्म के नजर ले देखे जाय त राजिम कुंभ के असली पहिचान साधु-संत मन के जुरव, भजन-कीर्तन अउ सतसंग ले होथे। फेर ए दारी ए पवित्र मेला ह सिरिफ एक सरकारी 'इवेंट' बनके रहि गे हे। चारो मुड़ा निजी इवेंट कंपनी मन के दबदबा हे अउ सरकारी विभाग के कहुं अता-पता नइ हे। परसासन ह अपन जिम्मेदारी ला इवेंट मैनेजर मन के हाथ म सोंप दे हे, जेकर ले मेला के ओ पुराना परंपरा हेरागे हे जिहां सरधा अउ भगती के बास होवत रहिस। अब ए ह धरम के मेला कम अउ राजनीति के अखाड़ा जादा दिखत हे।
विष्णुदेव सरकार के सुसासन अउ 'मोदी के गारंटी' के नारा के बीच प्रशासन के काम करे के तरीका म बड़े सवाल उठत हें। जिला प्रशासन अउ संस्कृति विभाग म तालमेल के अतका कमी पहिली कभू नइ देखे गिस। छोटे-छोटे समस्या मन घलो बड़े बनगे हें, फेर जिम्मेदार मंत्री अउ अधिकारी मन अपन फरज निभाय के बदला सिरिफ परचार म मगन हें। जब घलो अव्यवस्था म सवाल करे जाथे, त समाधान करे के बदला केंद्र अउ राज्य के योजना मन के नाव लेके असल मुद्दा ला दबा दे जाथे। अधिकारी मन अपन मनमर्जी करत हें, जेकर दुख जनता ला सहे बर पड़त हे।
अगर आने वाला बखत म राजिम मेला के प्रबंधन म सुधार नइ करिस, त एकर मान-मरजादा ह पूरी तरह ले सिरा जही। राजिम के मनखे मन के ए कहना कि "ए ह सरकारी कुंभ आय, जनता के नइ", सरकार बर एक बड़े चेतावनी आय। सिरिफ नाव बदले ले अउ भव्यता के ढोल पीटे ले सरधा के केंद्र नइ बचे, एकर बर संवेदनशीलता अउ सुघ्घर परबंधन के जरूरत होथे। अगर सरकार सही म राजिम के साख ला बचाना चाहत हे, त ओला 'इवेंट कल्चर' ला छोड़के मेला ला फेर ले जन-आस्था अउ सुव्यवस्थित प्रशासन ले जोड़ना पड़ही।


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