वरिष्ठ साहित्यकार अउ प्रखर विचारक सुशील भोले जी के चले जाना केवल एक मनखे के जाना नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ी साहित्य अउ वैचारिक चेतना के एक युग के अंत आय। वो मन ह 'मयारू माटी' के माध्यम ले न केवल छत्तीसगढ़ी पत्रकारिता ला नवा दिशा दीन, बल्कि 'आखर अंजोर' जइसन रचना मन ले हमर मूल संस्कृति अउ आदिधर्म के पुनर्स्थापना बर जीवन भर संघर्ष करिन।
भोले जी के जीवन ह साहित्य साधना अउ कठिन आत्म-साधना के एक अनूठा संगम रिहिस। 14 साल तक सांसारिक सुख मन ले दूर रहिके वो मन ह जेन आध्यात्मिक गहराई प्राप्त करिन, उही उंकर लिखई के असली ताकत बनीस। अभाव अउ गरीबी के बीच घलो वो मन ह कभु अपन कलम अउ सिद्धांत मन ले समझौता नइ करिन। पाछु कुछ बछर ले लकवा (पैरालिसिस) जइसन गंभीर बीमारी ले जूझत हुए घलो घर के चारदीवारी ले उंकर 'साहित्य साधना' अनवरत चलत रिहिस, जेन उनकर अटूट हौसला के प्रमाण आय।
लकवा ग्रस्त होय के बाद भोले जी शरीर ले जरूर टूट चुके रिहिन, फेर मन ले वो मन तब घलो 'छत्तीसगढ़ महतारी' के सेवा बर आतुर दिखत रिहिन। जब वो मन ह मोला (जयंत साहू) अपन लिखई-पढ़ई के विवशता अउ पीरा ला बताईन, तब मैं ह उनला ऑनलाइन अउ डिजिटल प्लेटफॉर्म ले जोड़े के कोसिस करेंव।
मैं ह उंकर बर 'मयारू माटी' के ब्लॉग बनाईन, फेसबुक, ट्विटर (X) में पोस्ट करे, अउ यूट्यूब चैनल में वीडियो डारे के तकनीकी बारीकी मन ला समझायेंव। मोला गर्व हे कि वो मन ह बहुत जल्दी अपन आप ला डिजिटल मंच में स्थापित कर लीन अउ पुन: साहित्य के दुनिया में उही दमदारी ले लौटिन, जेकर बर वो मन जाने जाथे। अपन सेहत के ध्यान राखत घलो वो मन ह आखिरी समय तक तकनीक के माध्यम ले दुनिया ले जुड़े रिहिन।
भोले जी हमेशा कहत रिहिन कि- "छत्तीसगढ़ के इतिहास अउ संस्कृति ल इहां के अपन माटी के नजरिया ले देखे जाना चाहिये, न कि कोनो बाहरी चश्मा ले।" उनकर ये सपना अउ उंकर रचे छितका कुरिया (काव्य संग्रह), दरस के साध (लंबी कविता), जिनगी के रंग (गीत एवं भजन संकलन), ढेंकी (कहानी संकलन), आखर अंजोर (छत्तीसगढ़ की मूल संस्कृति पर आधारित लेखों को संकलन), भोले के गोले (व्यंग्य संग्रह), सब ओखरे संतान (चारगोडि़या मनके संकलन), सुरता के बादर (संस्मरण मन के संकलन) जइसन अमर कृति मन आने वाला पीढ़ी मन बर हमेशा मशाल के काम करही।
छत्तीसगढ़ी माटी के ए सच्चा सपूत ल मोर विनम्र श्रद्धांजलि। साहित्य जगत में उंकर जगह हमेशा रिता रइही...।


सबो पाठक ल जोहार..,
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महतारी भाखा के सम्मान म- पढ़बो, लिखबो, बोलबो अउ बगराबोन छत्तीसगढ़ी।