बसंत पंचमी के दिन हमर छत्तीसगढ़ मा नवा उमंग लेके आथे। माघ महिना के अंजोरी पाख के पंचमी तिथि के मनाए जाए वाला ए तिहार ह ऋतुराज बसंत के अगवानी के सुग्घर बेरा आय। जइसे ही बसंत आथे, चारों कोती प्रकृति ह नवा रूप धर लेथे। खेत-खार मा सरसों के पींयर फूल मन अइसने लगत हे जनु धरती ह पींयर चूनरी ओढ़े हे। कोइली के कूक अउ मन्द-मन्द बउरत आमा के खुशबू ह मन ला गदगद कर देथे।
ए दिन बिहनिया ले लइका, सयान अउ सियान मन नहा-धो के माता सरस्वती के पूजा-अर्चना करथन्। माता सरस्वती ह गियान, बुद्धि अउ कला के देवी आय, एखरे बर स्कूल अउ कॉलेज मन मा विशेष कार्यक्रम रखे जाथे। लइका मन अपन पुस्तक अउ कलम ला माता के चरन मा राख के असीस मांगथन्। छत्तीसगढ़ मा ए दिन ला 'अक्षरारंभ' बर घलो बहुत सुभ माने जाथे, जेमा छोटे लइका मन ला पहिली बार अक्षर लिखना सिखाए जाथे।
छत्तीसगढ़ी संस्कृति मा बसंत पंचमी के दिन पींयर रंग के भारी महत्व हे। पींयर रंग ह खुसी अउ हरियाली के प्रतीक आय। ए दिन लोगन मन पींयर रंग के कपड़ा पहिरथन् अउ घर मा पींयर रंग के पकवान जइसे—मीठ चाउर (केसरिया भात), पींयर हलवा अउ लड्डू बनाथन्। माता ला घलो पींयर फूल अउ भोग चढ़ाए जाथे। गली-खोर मा लइका मन के पतंगबाजी देखत बनथे, अउ अगास ह रंग-बिरंगी पतंग मन ले भर जाथे।
बसंत पंचमी ह सिरिफ एक धार्मिक तिहार नो हे, बल्कि ए ह हमर जिनगी मा नवा जोस भरे के दिन आय। ए तिहार ह हम ला संदेश देथे कि अज्ञान के अंधियार ला दूर करके गियान के अंजोर बगराना चाही। छत्तीसगढ़ के किसान मन बर घलो ए हा खुसी के दिन आय, काबर कि खेत मा फसल मन लहलहाए लगथन्। माता सरस्वती के किरपा हम सबो झन ऊपर बने रहे अउ हमर छत्तीसगढ़ ह अइसने सुग्घर गियान अउ खुशहाली मा डूबे रहे, एही हमर अरजी हे।

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