Biography of Rekha Devar: रेखा देवार का जीवन परिचय

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Biography of Rekha Devar: रेखा देवार का जीवन परिचय
Biography of Rekha Devar: रेखा देवार का जीवन परिचय

रेखा देवार का जीवन परिचय

नाम: रेखा देवार
जन्मतिथि: 01/01/1972
जन्मस्थान: ग्राम कुकुसदा, जिला मुंगेली, छत्तीसगढ़
जाति / समुदाय: अनुसूचित जाति (घुमंतू देवार समुदाय)
राष्ट्रीयता: भारतीय
पता: ग्राम कुकुसदा, पोस्ट - मुंगेली, जिला मुंगेली, छत्तीसगढ़
भाषाएँ: छत्तीसगढ़ी, हिंदी
वर्तमान कार्यक्षेत्र: पारंपरिक देवार प्रदर्शन कला, लोक गायन, लोक नृत्य और नाट्य
अनुभव: 40 वर्षों से अधिक

रेखा देवार: जीवन परिचय

छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक धरती पर जब भी देवार लोककला की बात होती है, तो सबसे पहला नाम आता है रेखा देवार का। एक घुमंतू और निर्धन समुदाय से ताल्लुक रखने वाली रेखा आज देवार लोकनृत्य और लोकगायन की पहचान बन चुकी हैं। उन्होंने अपने जीवन में हजारों बार मंच पर प्रस्तुति दी है और अपनी कला के माध्यम से देवार समाज की विरासत को जीवंत बनाए रखा है।

प्रारंभिक जीवन और पारिवारिक पृष्ठभूमि

रेखा देवार का जन्म ग्राम कुकुसदा, जिला मुंगेली (छत्तीसगढ़) में हुआ था। उनके पिता श्री दशरथ और माता श्रीमती थनवारीन दोनों ही पारंपरिक घुमंतू देवार जीवन शैली का पालन करते थे। रेखा का बचपन अस्थायी तंबूओं में बीता, जहाँ उनका परिवार गाँव-गाँव जाकर प्रदर्शन करता था। उनके परिवार की आर्थिक स्थिति अत्यंत दयनीय थी, जिससे उन्हें शिक्षा प्राप्त करने का अवसर नहीं मिल पाया।

कलात्मक यात्रा की शुरुआत

रेखा ने अपनी दादी से प्रेरणा लेकर बाल्यकाल में ही गीत-संगीत और नृत्य की विधा सीखनी शुरू की। उनका स्वाभाविक कौशल जल्द ही पहचान में आया। पड़ोसी गाँव पथरिया के देवार कलाकार लाखा देववार ने रेखा की प्रतिभा को पहचाना और अपनी मंडली में उन्हें शामिल किया। तीन वर्षों तक मध्यप्रदेश के मण्डला ज़िले में प्रस्तुतियाँ देने के बाद पारिवारिक कारणों से रेखा को वापस अपने गाँव लौटना पड़ा।

स्वतंत्र मंडली और नवा अंजोरी

इसके बाद रेखा ने अपनी स्वयं की मंडली बनाकर छत्तीसगढ़ के विभिन्न गाँवों में प्रस्तुति देना शुरू किया। 1984 में उन्होंने "नवा अंजोरी" सांस्कृतिक दल से जुड़कर औपचारिक रूप से साक्षरता प्राप्त की। नवा अंजोरी के संचालक विजय सिंह ने उनकी प्रतिभा को निखारा और उन्हें अवसर प्रदान किए। बाद में रेखा ने विजय सिंह से विवाह किया और परिवार तथा कला, दोनों को आगे बढ़ाया। विजय सिंह के निधन के बाद भी रेखा ने हार नहीं मानी और पूरे आत्मविश्वास के साथ अपनी मंडली का संचालन किया।

प्रमुख कला विधाएं और प्रस्तुतियाँ

रेखा की प्रमुख विधाएं हैं:

  • देवार नाचा एवं नृत्य
  • कर्मा गीत
  • देवार लोकगाथा (दसमत कइना, नगेसर कइना, अहिमन रानी आदि)
  • चंदैनी
  • पंडवानी
  • भर्तहरी
  • विवाह विधि गीत
  • ढोला मारू आदि

रेखा ने 4000 से अधिक मंचीय प्रस्तुतियाँ दी हैं, जिनमें कई प्रतिष्ठित महोत्सव शामिल हैं:

  • लोक रंग महोत्सव, भोपाल (2023 सहित)
  • भारत भवन, भोपाल
  • इंडिया इंटरनेशनल ट्रेड फेयर, नई दिल्ली
  • जवाहर कला केंद्र, जयपुर
  • छत्तीसगढ़ राज्योत्सव, रायपुर
  • चक्रधर समारोह, रायगढ़
  • खजुराहो लोक कला यात्रा
  • ललित नारायण मिश्र विश्वविद्यालय, दरभंगा
  • इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़
  • साउथ सेंट्रल जोन कल्चरल सेंटर, नागपुर

विशिष्ट उपलब्धियाँ

  • "Ek Laal" नामक वृत्तचित्र में अभिनय
  • आकाशवाणी एवं दूरदर्शन की नियमित लोक कलाकार
  • Sahapedia द्वारा उनके गीतों का संरक्षण और प्रसारण
  • छत्तीसगढ़ संस्कृति विभाग द्वारा डिजिटल डॉक्यूमेंटेशन
  • गुरु घासीदास विश्वविद्यालय, बिलासपुर में उन पर आधारित डॉक्टोरल शोध कार्य, जिसे पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया गया – “देवार की लोक गाथाएं

सम्मान एवं पुरस्कार

  • संस्कृतिक दूत सम्मान (2013)
  • उत्तर क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र द्वारा कथा गायन सम्मान
  • राज्य युवा महोत्सव (1994)
  • राज्य लोकोत्सव (1997-98)
  • दाऊ महासिंह चंद्राकर सम्मान
  • देशज महोत्सव (संगीत नाटक अकादमी 2016)
  • दाउ मंदराजी सम्मान (छत्तीसगढ़ शासन संस्कृति विभाग 2021)

वर्तमान स्थिति और योगदान

आज के समय में छत्तीसगढ़ में एकमात्र सक्रिय देवार मंडली रेखा की है। जहाँ अधिकांश देवार कलाकार और मंडलियाँ लुप्त हो चुकी हैं, वहीं रेखा अकेले अपने कंधों पर इस कला को जीवित रखे हुए हैं। पति के निधन के पश्चात् भी उन्होंने 150 से अधिक प्रस्तुतियाँ मात्र दो वर्षों में दीं, जो उनके आत्मबल और महिला सशक्तिकरण का प्रतीक है।

उपसंहार

रेखा देवार न केवल एक कलाकार हैं, बल्कि संस्कृति की संरक्षक, महिला नेतृत्व की प्रतीक और देवार लोककला की जीवंत धरोहर हैं। एक अनुसूचित जाति की घुमंतू महिला होकर उन्होंने जो ऊँचाई प्राप्त की है, वह प्रेरणादायक है। उन्हें सम्मानित करना, एक पूरे समुदाय की परंपरा को सम्मानित करना होगा।

लेखक- जयंत साहू
संपादक- अंजोर छत्तीसगढ़ी मासिक पत्रिका


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