डॉ. बलदेव के काव्य भासा ... (82 वें जयंती म विशेष) : बसंत राघव अउ रितु साव

अंजोर
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हमर भारत हर क्रिसी परधान देस आय। आजो ले ए देस के कुल आबादी के आधा भाग हर क्रिसी मजदूर मन के आय एकर खातिर इहाँ के कला संस्कृति स्रम सउन्दर्य के मुंहरन म हवय। डॉ. बलदेव के सब्बेच रचना मन मा एही क्रिसी संसक्रीति या स्रम - सउन्दर्य के निरूपन होय हे, उंकर ए बिसे हर नवा नोहय, ओकर गाथा तो वैदिक युग ले आज तक चलत आत हे, फेर उंकर सिल्प उंकर सैली उंकर अपन आय। नित्तनूतन उन्मेस सालिनी के कहावत ल चरितार्थ करने वाला हे। ये ही बात डांड़ खिंचत छत्तीसगढ़ी भासा साहित्य के बिद्वान आलोचक नंदकिसोर तिवारी हर कहे हवय "सन् 1950 से आज तक की छत्तीसगढ़ी कविता में बिल्कुल अलग प्रयोग के दर्शन बलदेव की कविता में देखने को मिलता है, इस किस्म की कविता को लेंडस्केपिंग की कविता कहा जाता है। लैंडस्केपिंग अंग्रेजी का शब्द है, इसका अर्थ है, जो चीज जैसी दिखाई दे रही है उसका चित्रण वैसा ही होना चाहिए। हिन्दी में इसे परिदर्श कहा गया है। हिन्दी में इसका विस्तार चौतरफा है, जैसे ऊपर देखना, आगे-पीछे, दांये बांये से देखना। अंग्रेजी में इसका इतना विस्तार नहीं है, अस्तु इसे देखी हुई चीज का पूर्णता के साथ प्रस्तुति मानना चाहिए। इससे अलग हिन्दी में संस्कृत के समान 'प्रकृत काव्य की बात कही गयी है। प्रकृति को जैसा देखा जाय उसका चित्रण वैसा ही किया जावे। यह वर्णन मात्र फोटोग्राफी नहीं होता, उसमें कवि के साथ उसका सांसारिक ज्ञान, वासना, समाज से प्राप्त संस्कार और संस्कृति अन्तर्भूत होती है। ऐसा करके ही कवि अपने सामाजिक सरोकार का भी परिचय देता है (लोकाक्षर अंक 26 सिंत. 2004 पृ. 61) असल म डॉ. बलदेव के काव्य भासा म जउन खुलापन हे अर्थ के बिस्तार हे ये ही हर 'परिदर्श' के कारन आय। खास करके परक्रीति अउ रितुमन के बरनन म कवि हर अइसन रच-रचाव करे हे जेहर परम्परागत बिम्ब अउ प्रतीक ले बिल्कुल मिले आय न सादृश्य-बिधान ओइसे भी अर्थ ल जादा सुबोध, जादा इस्पस्ट अउ जादा बिस्तार देने वाला होथे, उदाहरन खातिर उंकर 'दोंगर' सीरसक कविता ल लिये जाय। दोंगरा या दंवगर छत्तीसगढ़ी के अप्रचलित सब्द आय, जेकर अर्थ बरसा के पहली बउछार होथे, पुनर्वास के खातिर ही, या फेर प्रचलन म लाय खातिर कवि एकर जानबूझ के परयोग करे हे, जेमा ओकर छत्तीसगढ़ी भासा बिसयक चिंता जाहिर होथे। अद्भुत लय अउ बिम्ब विधानी काव्य भासा के स्थाई या टेक एक प्रकार के हे-

लगत असाढ़ के संझाकुन
घन-घटा उठिस उमड़िस-घुमड़िस
एक सरवर पानी बरस गइस।

ए कविता के चार खंड हवय, परथम खंड म बरसाती बादर के पोनी (रूई) जइसे एती ओती उड़ना फेर सघन होके उमड़ना-घुमड़ना अउ अचानक ही बासुकी नाग के फन इसन ठड़ियाना ओकर अग्नि-रेख (विद्युत) जइसे जीभ के लपलपाना धरती के थर-थर कांपना अगास के दपदपाना (रहि रहि के उद्भासित होना) अउ सुरूज के बादर मन कस डूब जाना 'चाक्षुष बिम्ब' आय, जेकर ले कालिया दह जइसन द्रिस्य देखाउ दे लगथे। दूसर खंड म बादर के भारी होना चमकीला करिया जामुन जइसे भार ले झुकना, भकुना हाथी सोंढ़ जइसे धरती के सोध-सोंध सुवास ल सूंघना फेर जलकन मन के छर्र-छर्र ले बरसना चकित कर देने वाला आय-

मोती कस नुवा-नुवा
 नान्हें नान्हें जलकन उज्जर
सोंढ़ उठा सुरकै पुरकै
सींचै छिड़कै छरछर-छरछर

इहाँ बिसेसन अउ क्रिया मन के आवृत्ति, उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा अउ अनुप्रास आसाढ़स्य प्रथम दिवसे' के बिम्ब ल साकार कर देथे जेमा चक्षु, घ्राण, कर्ण जइसन इन्द्रिय बिम्ब हर जाग-जाग जाथे। बादर गरुआइ, जइसन छत्तीसगढ़ी के सांस्कृतिक मुहावरा हर एला अउ जादा गरिमा देहे लगथे। ए कविता आघू के खंड म 'धनुर्भंग अउ स्वयंम्बर' के हल्का हल्का गूंज सुनाई देथे -

के झड़ी लगा बरसै सुग्घर
करस के सत्धारा ले सोनहा पानी
पिंवराए धरती के उप्पर
पल्हरा पहार ले टकराइस

तड़ तड़ तड़ाक तड़ धनुखा टूटिस येहर 'भरे भुवन धुनि घोर कठोरा के अनुवरतन जइसन आय। आघू म सुरूज के पराभव अउ छुद्र नदी नाला मन के खलखल हंसना 'हँस रहा अट्टहास रावण खल-खल (निराला)' के अनायास ही सुरता करा देथे। इहाँ अन्त्यानुप्रास के रक्छा करे बर क्रम उलट गय हे, नइ तो कायदा ले चउथा अउ पांचवा डॉड़ मन ल सुरु म होना रहिस हे। जे पढ़वइया मन कवि के घनघोर चिंतन ल नई जानत हैं, तेमन एला दूर के कॅउड़ी गिनाई कह सकत हे फेर एहर अइसनेच बात आय, जेकर मैं खुद गवाह ऑव । डॉ. बलदेव गति, ध्वनि अउ परकास के बिम्बांकन म एती ओती सब्बो कोती

अपन प्रतिभा ल बिखेरत नजर आथें। खाड़ा धार पहाड़ अपन नाम के रुप अउ गुन दूनों ल चरितार्थ करत बरसा अउ सरद काल के बरनन एक्केच छंद म देखाय म समरथ हे - "उप्पर सन-सन हवा चलत हे गति के, देहे छुअत दाढ़ म स्पर्स के अउ घेरी बेरी लड़का हर तड़के धिड़कावत (कर्ण अउचक्छु) के बिम्वांकन हे, एकर तुरंत बाद कुमकुम जइसन बरसत धूप के चित्रांकन अनूठा हवय-

पहाड़ म अनगढ़ गढ़ा अउ खेत
चांद म करिया दाग
चमके सूरज माथा उप्पर
बरसै सोनहा फाग

इहां एक-एक सब्द मन मोती कस अलग-अलग अपन छटा बिखेरत देखाउ देत हे चंदा अउ सुरुज याने रात अउ दिन के बिरोधाभासी चित्रन । सरदकाल के मझनिया के सुरूज हर सोनहा फाग के अनुभूति करात हावै, ध्वन्यार्थ आय एकदम कड़कड़ाती जाड़ इहाँ 'सिसिर में ससि को सरुप पावै सविता' जइसन बात हे। भरपूर रवनिया लेहे अरथात् धूप म डेना ल सेंक लेहे के बाद सोन-पंखी चील हर पंजा म चट्टान ल दबोच के झपट्टा मार के उड़ गइस, इहाँ रुपकातिसयोक्ति अलंकार के सुग्घर परयोग होय हे जेहर सही माने म गति  अउ सक्ती के बोधक आय। कवि ह दुएच डॉड़ म बड़ कला-कौसल के साथ चित्रन दे हबय जेमा अर्थ विस्तार के अब्बड़ गुंजाईस हवय-

'एकेच ठन कथरी अउ दूझिन प्रानी (झीका तानी के आधा रात मत पूछ) हवा सीटी मारत बोहात हे' दिन भर हाड़ातोड़ मेहनत-मजदूरी के बाद नींद हर मसके लगथे दू प्रानी अरथात जोड़ी-जांवर बर एकठन एकेचठन कथरी हवे, जेकर बर खींचातानी चलत हे, अभाव अउ गरीबी के बाद भी गिरस्ती म जउन आनंद हे तेकर का पूछना, उप्पर ले हकन हकन के मारत हे जाड़ झन पूछ। गरबैतिन के गीत म श्रृंगार के दूनों पथ के चित्रन म नाद-बिम्ब हर देखे लाइक हे।

दहकत परसा, टपकत महुवा झिमझिम बाजे ना धनुखा के टंकार बरोबर भंवरा मन के गुंजार हर कोनों कामदेव के धनुस के टंकार ले कम नई होवय, फेर प्रान-पिया के बिना बसंत रितु म घर अंगना सांय-सांय याने सून्ना सून्ना लगथे। लगथे अंधियार कुरिया म सूते प्रिय के उप्पर सुरता के भभूत हर जइसे झरत हबय, जिनगी उजाड़ हो गये हे समे पहाड़ हो गय हे, फेर प्रान प्रिया के मन मा एके उन चाहत हे-

मोंगरा मम्हावे पुन्नी के चंदा
अउ मउहारी जाड़
अधरथिया नींद उचट गै 
जिनगी लगै उजाड़
कोइली कूकै पिछवाड़ा म

मोर मोंगरा घर आ गरबैतिन घर आ अइसन काव्य भासा हर पढ़इय्यन के हिरदे म सीध्धा रागात्मक अनुभओं पैदा करर्थे ये ही हर 'सम्प्रेसनीयता' के प्रमान आय। विप्रलंभ के दूसर चित्र लेवा, बरसाकालीन बादल मन के चकाचौंध म बिरहा मन हर आकुल बियाकुल होय लगथे-

रेत घड़ी आँखी आँखी म 
झूले आस निरास 
बिना गरज चकमक पथरा कस 
लौकत हे अकास 
एक छिन उजियारी 
अंधियारी एके छिन

आसा-निरासा के द्वन्द्व के येहर अजगुत चित्र आय "क्कचित् प्रकाश क्कचिद प्रकाश" खातिर एक छिन उजियारी, अंधियारी एके छिन जइसन परयोग बरसा-काल म बिरह के मनोभाव मन ल प्रभावी ढंग ले सामने लाथे। ऐहर बाहिर भीतर के दूनों भाव के चित्रन करथे, लेकिन ये सब क्रिया मन बिना अवाज के याने निस्सब्द होथे। छत्तीसगढ़ी म "साल्हो" हर यौन गंधी गीत आय याने घनघोर श्रृंगारिक गीत आय, इहाँ भी ददरिया के दू चार डार देखे लाइक हवै-

हरदी चुपर के आमा बउराय 
रसे रस छींटा देह लसलसाय 
मउर के गमके सांस रुकजाय 
चपचपहा भुइयाँ पांव लपटाय 
गझिन अमरइया लुकाय हे कहूँ 
बइहर के बहके महक मारे 
मधुरस के लोरस म पंख लपटाय 
उड़े के सखनइये, भौंरा टन्नाय

बसन्त इहाँ पूरा उफान म हे, आमा के मउर के चुहे रस ल भुइयाँ भींग गय हे वोहर चले ले पांव म चिपके लगथे, एती थोरकन हवा चलिस अउ गमक अतका भारी हो गइस के सांस लेना भी दूभर हो जात हे, उप्पर ले कामदेव अपन नाम ल सारथक करत इहाँ कहूँ सघन अमराई म पुस्प बान साधे लुकाय हे। डॉक्टर बलदेव नारी के मांसल देह के बरनन करत हुए भी वोकर सील स्वभाव के निस्कलुस बरनन करे म सचेत हवय। कोनो गँवई गाँव के बहुरिया बाड़ी-बखरी म काम करके घर कती लहुटत हे, बीच म नाला हे, वोहर घुटना हरदे म भर पानी म जल्दी-जल्दी, माड़ी भर पानी म लुगरा ले उप्पर सरका के धीरे-धीरे नाला ल नहकत है-

निटरंग पानी फरियर, झलके जांघ गाध हरियर/लपट उठत उप्पर उठत लाली फरिया फहरै फरफर / छबकय छेंकय छाती उघरै अगम धार कांपै थरथर / जांघ छुवत मछरी चमकै उतरय चघय धार उप्पर / तुर्र तुर्र तुर्र तितुर बोलय- टिहीं टिहीं टिटही टिंहकय धार तेज हवय/हवा म लाल रंग के फरिया उप्पर उठ उठ के फहरत है, जाना-माना कामदेव के धजा होय। बार-बार छाती उघरत है अउ वो बहुरिया खतरा के समे भी वोला हाँथ म ढाँके के कोसिस करत हे। मछली के चमकना, तितुर अउ टिटही के बोली हर बासना के उत्तेजक - उद्दीपन आय। गँवई गाँव के ये बहुरिया हर एकदम गेदराय जेवानी म हे एकर बर कवि हर जांघ हरियर अउ थन भारा के सारथक परियोग करे हवै, फेर आघूच काश" म ओतकेच बेर ओहर ओमा सम्पूर्न मातृत्व के बोध घलोक करा दे हवै। नारी के मांसलता उप्पर लाज के झीना आवरन हर ओला वासनामयी ले लावण्यमयी ममतामयी बना देथे । इहें डाक्टर बलदेव के काव्य कला के असली दरसन होथे। वास्तव म वो 'लेवई' (पहिलावत ब्याहे गाय) छत्तीसगढ़ के स्रम - सउन्दर्य अउ मांसलता के उप्पर लज्जा के 'अवगुंठन' ल व्यक्त करने वाला सबल रचना आय। ऐही बात ल कवि हर छत्तीसगढ़ मइय्या ल कामधेनु या कलोर मइय्या के रूप म चित्रन करके ओला अउ अधिक महिमा-मंडित कर डारे हे-

चरत हे गइया कलोर रे कदली बन मा
छुए ले पर जाही लोर रे कदली बन मा
माछी फिसल जाही बइठेच म ओ
पेट-पीठ ले उठै हिलोर रे कदली बन म

गाय-बछरी के देंह म एक कंकड़ भी पर जाही त वोहर ओही मेर ल कंपा के कंकड़ ल गिरा देही अउ कलोर के कोना जगा ल छू देवा वोहिच मेर हिलोर उठ जाही। येहर बस्तु जगत के साब्दिक चित्रन आय फेर एकर भासा के संकेत अमूर्त भाव मन ल उद्भासित करत नजर आथे । बिसिस्ठ अर्थ म आय ब्यंग्यार्थ म येहर छत्तीसगढ़ के सुख-सान्ति, रिजुता याने सरलता समरिद्धी अउ निस्कलुस सउन्दर्य ल परगट करथे, येही हर तो कवि के निजता याने सैली आय। डॉ. बलदेव अपन अनुभव ल चाहे वोहर एकदम सरल होवै के निखालिस जटिल होवय समर्थ भासा देहे म सक्छम हवैं। डॉक्टर बलदेव के मन-प्रान हर परक्रीति सउन्दर्य म बार-बार रमत आवत हे। उन परक्रीति सउन्दर्य के एक ले बढ़के एक अनूठा पन के सिरजन करे हवयै, जेमा गति, छाया अउ प्रकास ल पकड़े के अद्भुत कला- कौसल हवय-

उड़त हे भंवरा करौंदा के झुंड 
डोले डिंडोलना कउहा अउ कुंड 
अंजोरी पाख दिखै जल-मोंगरा 
उछलै मछरी छलकै कुंड

'उछलै मछरी छलकै कुंड' छाया चित्र मन के गति अउ निरमल जल के भीतर फूटने वाल जल मोंगरा के उजास म अंजोरी पाख के कल्पना बलदेव जइसन प्रकृत काव्य के कवि ही कर सकत हे, एमा रंग संयोजन अउ ध्वनि संयोजन घलोक हर अजगुत हे, अबाधित लय म ये रचना दूर भीतर ले बाहिर कती प्रक्छेपित होत नजर आत हे ए सन्दर्भ म उंकर फटक्का कविता भी अकेल्ला याने अद्वितीय रचना आय। एमा सरल ले सरल वाक्य संरचना ले तीव्र, मद्य अउ मन्द ध्वनि अउ हल्का गाढ़ा, घूसर अउ चटक रंग के विरोधाभासी बिम्ब मन के निर्माण वाल दीप-पूरब के सउन्दर्य ल बिखेरे गय हे-

कहूँ धमाक ले गोला छूटे दनाक ले 
कहूँ बम फूटै भांय, गगन घटा घहराय 
कहूँ, सर्रट ले उड़के फेंकाय फक ले 
कहूँ फुस्स ले बिन फुटे बुझ जाय 
जगमगात खंभा नीला, पीला कहूँ हरा लाल।

अइसने कई ठन परब, तीज-तिहार आदिवासी नृत्य, झांझ-मांदर के थाप ले समूचा गीत के डांड़ मन झंकार पैदा करत रथें। करमा नाच के एकठन द्रिस्य बिम्ब देखा जेमा झूमर अउ लहकी के नचकार मन के संगे-संग धरती घलोक हर नाचत देखाऊ दे थे-

धाधिन तिंता धाधिन्ना 
झझरंग झझरंग झर्रंग ले

मांदर के बोल के संगे संग पागा के झूम्मर हाथ के लूर मन के हिले, डुले लगथे अउ गाँव नृत्य के लय म डूबे तिरे उतराय लगथे - 

बाजत हे मांदर झूमरत हे गाँव 
करमा के बोल उठै थिरकत हे पांव 
झूमर अउ लहकी म घुमरत हे भुइंया 
अखरा म माते झुमरत हे गुइंया

इहाँ नृत्य-संगीत के परभाव समूचा चरअचर म परत हवय । ध्वन्यात्मकता अउ एक विचारात्मकता ले इहाँ भासा हर मांसल अउ गझिन हो गय हे। श्री भगतसिंग सोनी हर डॉ. बलदेव के रचनामन बर एकदम सही टिप्पणी करे हवय - "इनकी रचनाओं में छत्तीसगढ़ी जीवन शैली ही संस्कृति एवं प्रकृति पर फोकस किया गया है उनकी कविता की भाषा में बनावटी पन के दर्शन नहीं होते। बरबस भाषायी मिठास एवं सधे हुए शिल्प से वे भाषा में जादू या चमत्कार पैदा करते है।" (लोकाक्षर सितम्बर 1999 पृ. 12) डॉ. बलदेव के कविता महागाथा लिख थे जिहां बुद्धिजीवी कठिन स्रम ले जी चोराथे उहें मेहनती आदमी कठिन संघर्स करत अपन लक्छ म कामयाब होथे। दू ठन बिरोधी चरित्र ले कविता कइसन उड़ान भरथे, देख भला ठाढ़, मंझनियाँ। नान नान  सुरुज के रूप धरे गुखरु मन सोनहा उजास फेंकत हें चारो मुड़ा आँखी ल सूजी कस डूबत हे। फांस कस गुखरु के कांटा मन चूभत हे। बिबाई फटे पांव मा। गुखरु गड़े के डर मा। पियास मरत ठाढ़ेच हवै मेंड़ पार म। अउ ओहर / गर्रुहन रेंगत हे गुखरु उप्पर। जाल अउ ढिटोरी धरे।  डबरी म सुरुज ल पकड़े बर।

परचंड सूर्य के ताप ल असंख्य सुरुज के रुप म उद्भासित गुखरु के कांटा मन अउ जादा बढ़ात हें, बिराट के लघु ले तुलना इहाँ बिचलन आय जे हर इहाँ अर्थ-गौरव के कारन आय। इहां केन्द्रीय बिम्ब सूरज हर आय जेहर गोखरु, म रूपांतरित होत जात हे,  एहर उत्कट जिजीबिसा के सटीक प्रतीक आय, ए सूरज हर अमूर्त मछली ल इहाँ मूर्त करत हे।

उन मूक-दरसक न होके मारक भासा म तकलीफ दुख-दर्द ल व्यक्त करत मन के घलोक जाँच ए संदर्भ म घुन अउ इज्जत उनकर प्रतिनिध कविता आय जेमा जेतके ताकत कथ्य हे ओत के ताकत वोकर सिल्प घलोक म हाबै ।

पाटी ल घुन हर चरत हे, खोलत हे
धुप अंधियारी हर दांत ल कटरत है
मुड़का म माथा ल भईसा हर ठेसत हे
मन्से के उप्पर धुना हर गिरत हे झरत हे

घुन या घुना हर लकड़ी ल खोलखा कर देथे (खातू कर देथे) लकड़ी के कटे के अवाज अंधियार या निरासा के दांत कटरई (काटना चबाना) म रूपान्तिरत हो जाथे, ऐही बात के किसान के चिंता ल, तकलीफ दुख-दर्द ल भईसा के मुड़का-मियार म माथा टेंसना (पटकना) जइसन क्रिया ले व्यक्त करे गय हे, ये पीरा के हतासा के चरम सीमा आय। 

छत्तीसगढ़ के किसान अब्बड़ मेहनती हे वोहर अत्तेक सरल, सिधवा अउ सहनसील आय के कोनो भी आसानी ले ओकर सोसन कर ले थे। वोकर सुविधा अउ जरूरत के बात तो छोड़ा, वोकर बर होने वाला अन्याय सोसन के प्रतिकार घलोक के चिन्ता ए सभ्य समाज ल नइये। मेहनती मनखे मार खा के भी कछु नई बोलै फेर मारने वाला ल वोहर एक पइत तो भरे आंखी ले देखिच लेथे। वोकर जी लेवा गुस्सा के चुप्पी हर छत्तीसगढ़ के आने वाला जनक्रांति के पूर्व सूचना आय।

बासी के सेवाद लेत मस्तराम मुचुर मुचुर हांसथे। एक बटकी बासी देवा अउ दिन भर जानवर कस काम लेवा मस्तराम कभू-कभू लहुलुहान हो जाथे तभ्भो ले कछु नई बोलै। न रोवै न चिल्लाय। भेद भरे मुस्कान के संगे संग आंखी चमकथे । अउ कोरा कोरा भीग जाथे। मस्त राम तो मस्तराम आय भला ओला का चाही। उप्पर ले सरल सान्त परक्रीति के ये रचना हर बिस्फोटक रचना आय। यह मात्र छत्तीसगढ़ी मनखे के संतोस ल व्यक्त नई करै, इहाँ गूंगा अउ जुबान सब्द बड़े ही खतरनाक ढंग ले आए हे।

डॉ. बलदेव संस्कृत अंग्रेजी बंगला, असमिया साहित्य के गंभीर अध्येता आय, एकर बर उंकर ये गहन अध्यवसाय के अंकर रचना म काफी परभाव परे हे। इहाँ दू ठन छोट छोटे संस्क्रीत अउ अंग्रेजी साहित्य (बाल्मीकि अउ सेक्सपीयर) के परभाव दिखाए जात हे-

जाड़ के दिन चौमासा के बाद 
जादा उजियाला। अउ अकास बड़ चमकीला 
हो जाथे। फरसा के धार असन 
बिखर्रा। गाज छोड़े के बाद 
पहिली ले जादा चमकीला 
अउ जहरीला हो जाथे।'
बटर फ्लाई के जोड़ के दूसर रचना देखा-
दंतइया कस लक लक ले। दिखत हस गा)     
ओइसनेच रंग / तपे सोना कस 
ओइसनेच रूप / कनिहा मूठा भर 
अउ डंक / ओइसनेच दंतइया कस

संक्छेप म डॉ. बलदेव के काव्य भासा अब्बड़ 'संगीतात्मक' हे, वोहर सउन्दर्य बोध के एक किसिम ले परयाय आय। उंकर रचना परक्रीया ले मैं थोर बहुत परिचित हंव एकरे खातिर उंकर भासा विसयक चिंता ल व्यक्त करे बर एतका कुछ लिखे बर परिस, नइतो उंकर कविता खुदे बोलत गोठियत चलत-फिरत, दिखथे ओला बैसाखी के जरूरत नइये।

बसन्त राघव
पंचवटी नगर,मकान नं. 30
कृषि फार्म रोड,बोईरदादर, रायगढ़,
छत्तीसगढ़,basantsao52@gmail.com मो.नं.8319939396

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सबो पाठक ल जोहार..,
हमर बेवसाइट म ठेठ छत्तीसगढ़ी के बजाए रइपुरिहा भासा के उपयोग करे हाबन, जेकर ल आन मन तको हमर भाखा ल आसानी ले समझ सके...
छत्तीसगढ़ी म समाचार परोसे के ये उदीम कइसे लागिस, अपन बिचार जरूर लिखव।
महतारी भाखा के सम्मान म- पढ़बो, लिखबो, बोलबो अउ बगराबोन छत्तीसगढ़ी।

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