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छत्तीसगढ़ी छंदकार स्व . महेद्र देवांगन ‘माटी’ जी ल सादर कवितांजलि : अब्बड़ सुरता आवत हे... प्रिया देवांगन ‘प्रियू’


अब्बड़ सुरता आवत हे , पापा तोर आज।

कइसे करहु पापा मेहा , तोर बिना काज।।


ऊँगली पकड़ के तेहा , मोला रेंगे ला सिखायेस।

एक कनी घुस्सा हो जाओ  , आके मोला मनायेस।।


तही मोर गुरु हरस , तही हरस मोर संगवारी।

तोर बिना सुन्ना होगे पापा , आज मोर दुवारी।।


*माटी* तोर नाम हे , आज माटी में मिल गेस।

सब कुछ मोला ते दे देस , मोर से कुछु नइ लेस।।


हाथ धरके मोर तेहा , कविता लिखे ल सीखायेस।

अपन बेटी ल आज पापा , कवि ते बनायेस।।


हर जनम में तेहा पापा , मोरे करा अब आबे।

मोला छोड़ के *माटी*  , दूसर करा झन जाबे।।


माटी के मेहा बेटी हरो , पकड़े रेहेस मोर हाथ ।

छोड़ के काबर चल देस , आज तेहा मोर साथ।।


तही मोर संगी साथी , तही रेहेस मोर सँगवारी।

सुन्ना करके चल देस पापा , आज मोर दुवारी।।


कोन ल बताहूँ मेहा , अपन मन के बात ल।

अकेला होगेंव पापा मेहा , कइसे बिताहूँ रात ल।।


अब्बड़ सुरता आवत हे , पापा तोर आज।

कइसे करहु पापा मेहा , तोर बिना काज।।

 0 प्रिया देवांगन ‘प्रियू’ पंडरिया, छत्तीसगढ़

1 टिप्पणी:

  1. बधाई जयंत भाई!!बरछाबारी अउ चौपाल में आपके रचना पढन।लेखन से समाचार पत्र तक के सफर बर बधाई

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