फिल्म सिटी बनाम जंगल कटाई : फिल्मकार बर जंगल एक जीता-जागता 'नेचुरल स्टूडियो'

अंजोर
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फिल्म सिटी बनाम जंगल कटाई :  फिल्मकार बर जंगल एक जीता-जागता 'नेचुरल स्टूडियो'

छत्तीसगढ़ी फिल्म उद्योग ल बढ़ावा दे खातिर छत्तीसगढ़ शासन कोति फिल्म सिटी बनाये के प्रस्ताव पास होगे हाए। चित्रोत्पला फिल्म सिटी खातिर शासन ह तूता-माना के चयन करे हावय। अब निमार्ण कार्य तको शुरू होवइया हाबे, अइसन म आरो मिलिस के जिहां फिल्म सिटी बनाये जाना हे उहां तो बड़का जंगल हे हजारों रूख-राई हे, अइसन म उहां पेड़ ल काटे बिना फि​ल्म सिटी नइ बन सकय। तो सबसे पहिली सरकार ह पेड़ काटना शुरू कर दे हावय। सोच के बात आए के फिल्म सिटी बर अइसन ठउर के चयन काबर करे गिस जिहां पेड़ पौधा लगे हावय। अब का फिल्म म पेड़ जंगल के जरूरत नइ परे, का फिल्म सिटी के नाम म सिरिफ महले-महल खड़ा होही?

दूसर कोति आम जनता तो विरोध करत हाबे, कुछ कलाकार मनला छोड़ के पूरा छॉलीवुड चुप हावय। सोचे के बात आए के कलाकार मन भावनात्म मनखे होथे, का ओमन ल पेड़-पौधा अउ प्रकृति ले प्रेम नइये? तूता-माना में फिल्म सिटी बने के खुशी तो हाबे फेर ओकर ले बड़का दुख उहां के पेड़ कटे के हावय।

इही ओढ़र म छत्तीसगढ़ी सिनेमा के एक बड़का कलाकार पुष्पेन्द्र सिंह ह सोशल मीडिया म जबर बात उठावत किहिन के- छत्तीसगढ़ के जम्मों कलाकार संगी मन ले मोर बिनती हे कि हमन ल जल्दी एक दिन तय करके 'तूंता' के जंगल पहुँचना चाही। सरकार ह फिल्म सिटी बनाए के नाँव म जंगल ल काटे के तियारी करत हे, जउन ह बहुते चिंता के बात हे। एक कलाकार के नाता हमर ये धरम बनथे कि हमन अपन जंगल अउ पर्यावरण ल बचाए बर आगू आवन। फिल्म सिटी म जंगल के अपन एक महत्व होथे, अउ ये सरकारी तंत्र ह जंगल काटे के सिवा दूसर कुछू नइ सोंचत हे।

हमन ल मालूम हे कि हमर कुछू कलाकार संगी मन सरकार म हें, अउ ओ मन सायद हमर साथ नइ दे पाहीं। मैं ओ मन के असमर्थता ल समझथों, ओ मन करा अतका हिम्मत नइ हे कि सरकार के विरोध म खड़ा हो सकें। फेर जउन मन स्वतंत्र हें अउ जउन मन म हिम्मत हे, ओ मन ल जरूर साथ आना चाही। 15 तारीख के दिन हमन सब झन तूंता म मिल सकथन अउ ये पेड़ कटई के काम ल रोक सकथन।

जंगल कटई ले रायपुर के तापमान ह अउ बढ़ जाही, जेकर ले हमन ल अउ आने वाला पीढ़ी ल पानी के भारी किल्लत झेलना पड़ही। शहर म अउ बहुत कन खाली जमीन पड़े हे जहाँ बिल्डिंग मन ल बनाए जा सकत हे, फेर ये तंत्र ह जान-बूझ के जंगल ल काटे बर तुले हे। ये ह सिरिफ पर्यावरण के नुकसान नइ हे, बल्कि हमर आने वाला कल के संग खिलवाड़ हे।

फिल्म सिटी के मतलब सिरिफ बड़े-बड़े बिल्डिंग नइ होवय। एकर बर हमन ल जंगल, गाँव, अस्पताल, थाना अउ एयरपोर्ट सब के जरूरत परथे। अगर हमन आज ये जंगल ल काट देबो, त आने वाला समय म जब हमन ल शूटिंग बर जंगल के सीन के जरूरत पड़ही, त हमन कहाँ जाबो? ये निर्णय लेवइया मन ल ये छोटे से बात समझ नइ आवत हे कि जंगल के बिना फिल्म सिटी अधूरा हे।

ये पेड़ मन ल काटना एक अपराध अउ अमानवीय काम हे। जउन कलाकार साथी हमर साथ नइ आना चाहत हें, ओ मन ल ये बताना चाही कि ओ मन काबर नइ आवत हें? का ओ मन ल अपन पर्यावरण अउ आने वाला संकट के फिकर नइ हे? हमन ल एकजुट हो के ये विनाश ल रोकना पड़ही, तभे हमर छत्तीसगढ़ सुरक्षित रहिही।

संगी हो, अब समय आ गे हे कि हमन अपन कला अउ अपन माटी बर खड़े होवन। छत्तीसगढ़ के सुघ्घर प्रकृति ही हमर असली पहिचान हे। अगर प्रकृति ही नइ रहिही, त हमर कला के का मोल? आओ सब झन मिल के ये जंगल ल बचावन अउ सरकार के ये गलत निर्णय के विरोध करन। जय जोहार, जय छत्तीसगढ़!

ये विषय म पर्यावरणविद के नजरिया: जंगल कटई के गंभीर दुष्परिणाम

तापमान म बेतहाशा बढ़ोतरी (Global Warming के असर):

रुख-राई मन धरती के 'फेफड़ा' बरोबर होथें। तूंता के जंगल ह रायपुर अउ ओकर आसपास के इलाका बर कूलर के काम करथे। अगर ये पेड़ मन ल काट दे जाही, त 'अर्बन हीट आइलैंड' के स्थिति बन जाही, जेकर ले गर्मी के दिन म तापमान 45-48 डिग्री तक पहुँच सकत हे। कंक्रीट के जंगल ह घाम ल सोखही अउ रात म घलो उमस कम नइ होही।

भू-जल स्तर म गिरावट अउ पानी के अकाल:

जंगल के पेड़ मन अपन जरा (root) के माध्यम ले बरसाती पानी ल धरती के भीतर ले जाथें (Groundwater recharge)। जंगल कटे ले पानी ह जमीन के भीतर नइ जा पाय अउ बह के निकल जाही। रायपुर जइसन तेजी ले बढ़त शहर म पहिली ले ही पानी के समस्या हे, जंगल कटे ले वाटर लेवल अउ नीचे गिर जाही, जेकर ले आने वाला समय म कुआँ अउ बोरिंग मन सूख जाहीं।

जैव विविधता (Biodiversity) के बिनास:

एक ठन जंगल म सिरिफ पेड़ नइ होवय, ओ म कतको किसम के चिरई-चिरगुन, कीरा-मकोड़ा अउ छोटे जीव-जंतु मन के घर होथे। जब जंगल कटथे, त ये जम्मो जीव मन बेघर हो जाथें। कतको अइसन प्रजाति हें जउन विलुप्त हो सकत हें। प्रकृति के चक्र (Food Chain) बिगड़ जाही, जेकर असर अंत म मनखे मन के ही सेहत अउ खेती-किसानी म परही।

हवा के सुघ्घरई म कमी (Air Pollution):

रायपुर म पहिली ले ही धूल अउ प्रदूषण के समस्या जादा हे। रुख मन हवा ले कार्बन डाईऑक्साइड ल सोखथें अउ हमन ल ऑक्सीजन देथें। अगर तूंता के जंगल ल साफ कर दे जाही, त हवा म जहरीली गैस मन के मात्रा बढ़ जाही। एकर सीधा असर मनखे मन के फेफड़ा म परही अउ दमा (Asthma) जइसन बीमारी घर-घर म फैल जाही।

माटी के कटाव (Soil Erosion):

पेड़ के जरा मन माटी ल जकड़ के रखथें। जब जंगल साफ हो जाही, त पहली बरसात म ही उपजाऊ माटी बह के निकल जाही। एकर ले जमीन ह बंजर हो जाही अउ आसपास के नदिया-नरवा म कीचड़ भर जाही। ये ह सिरिफ पर्यावरण बर नइ, बल्कि ओ इलाका के कृषि व्यवस्था बर घलो घातक साबित होही।

मनोवैज्ञानिक अउ सामाजिक असर:

पर्यावरणविद मन के मानना हे कि हरियाली ले मनखे ल मानसिक सांति मिलथे। कंक्रीट के ढांचा मन के बीच म जंगल एक 'ग्रीन लंग' (Green Lung) के काम करथे। जंगल ल काट के ओकर ऊपर बिल्डिंग खड़ा करना 'अमानवीय' हे। ये ह हमर आने वाला पीढ़ी ले ओकर सुघ्घर भविष्य ल छीनना हे। फिल्म सिटी जइसन विकास बर अइसन जमीन के चुनाव करना चाही जउन बंजर हो, न कि हँसत-खेलत जंगल ल उजाड़ना चाही।

फिल्मकार बर जंगल एक जीता-जागता 'नेचुरल स्टूडियो'

एक कलाकार अउ फिल्मकार बर जंगल ह सिरिफ रुख-राई के समूह नइ होवय, बल्कि एक जीता-जागता 'नेचुरल स्टूडियो' होथे। फिल्म सिटी म जंगल होय ले फिल्मकार मन ल का-का लाभ मिलथे, ओला ये बिन्दु मन म समझ जा सकत हे:

1. वास्तविक लोकेशन अउ सुघ्घर दृश्य (Authentic Visuals)

कोनो घलो फिल्म म अगर जंगल के सीन दिखाना हे, त ओला स्टूडियो म बनाय ले ओ 'अस्लियत' नइ आय। प्राकृतिक जंगल म रुख मन के फैलाव, सूरज के किरन मन के छन के आना (God rays) अउ प्राकृतिक सुघ्घरई ह पर्दा म जादू बरोबर दिखथे। कलाकार मन ल घलो अइसन माहौल म काम करे म सहज अउ वास्तविक महसूस होथे।

2. लागत म भारी कमी (Cost-Effectiveness)

अगर फिल्म सिटी म पहिली ले जंगल मौजूद हे, त निर्माता-निर्देशक मन ल बड़े सेट (Set) बनाए के जरूरत नइ परय। जंगल के सीन बर पेड़-पौधा, झाड़ी अउ प्राकृतिक रद्दा मन पहिली ले तैयार मिलथें। एकर ले फिल्म के बजट ह कम हो जाथे अउ ओ पइसा ल तकनीक अउ दूसर काम म लगाय जा सकत हे।

3. 'साउंड डिजाइन' बर प्राकृतिक संगीत (Natural Soundscapes)

फिल्म म सिरिफ चेहरा नइ, आवाज घलो जरूरी होथे। जंगल म चिरई-चिरगुन के चहकना, हवा म पाना मन के सरसराहट अउ सांति ह एक अइसन 'एम्बिएंस साउंड' (Ambience Sound) देथे, जउन ल डबिंग स्टूडियो म पैदा करना मुस्किल हे। ये ह फिल्म ल एक अलग गहराई (Depth) देथे।

4. विविधता (Versatility for Genres)

जंगल ह हर किसम के फिल्म बर काम आ सकथे:

  • ऐतिहासिक फिल्म: राजा-महाराजा अउ पुराना जमाना के सीन बर।
  • डरावनी फिल्म (Horror): रात के समय जंगल के डरावना माहौल बर।
  • रोमांटिक फिल्म: सुघ्घर हरियाली अउ झरना मन के सीन बर।
  • एक्शन फिल्म: लुका-छिपी अउ चेजिंग (Chasing) सीन बर।

5. शूटिंग बर अनुकूल वातावरण (Favorable Micro-climate)

खुला मैदान या कंक्रीट के सेट म शूटिंग करत समय गर्मी बहुत जादा लगथे, जेकर ले कलाकार अउ क्रू जल्दी थक जाथें। जंगल के भीतर के तापमान ह शहर ले 4-5 डिग्री कम रहिथे। पेड़ मन के छाँव म हेवी लाइट अउ कैमरा इक्विपमेंट मन के बीच काम करना आसान हो जाथे।

6. छत्तीसगढ़ी संस्कृति के दर्शन (Showcasing State Identity)

छत्तीसगढ़ के असली पहिचान ओकर जंगल अउ आदिवासी संस्कृति हे। अगर फिल्म सिटी म जंगल ही नइ रहिही, त हमन अपन माटी के असली कहानी ल दुनिया ल कइसे दिखाबो? छत्तीसगढ़ी फिल्म मन म जंगल ह एक 'किरदार' (Character) बरोबर होथे। अगर जंगल बाचही, तभे हमर सिनेमा म 'छत्तीसगढ़ियापन' दिखही।

सार बात ये हे: फिल्म सिटी बर जंगल ल काटना अइसन हे जइसे कोनो कलाकार के कैनवास ल फाड़ देना। बिना प्रकृति के, कला ह बेजान हो जाही।

- छत्तीसगढ़ी भाषा के वेबसाइट 'अंजोर' अइसन गलत फइसला के विरोध करत हाबे। फिल्म सिटी बने लेकिन जंगल उजाड़ के नहीं, बल्कि हरियाली के बीच बनना चाही। www.anjor.online के संपादक जयंत साहू के ये ते मानना हावय के फिल्मकार बर जंगल एक जीता-जागता 'नेचुरल स्टूडियो' आए।

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