न्याय के तराजू म रसूख के वजन: गरीब बर तारीख, बड़े मनखे बर तुरते फैसला

अंजोर
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संपादकीय। न्याय व्यवस्था के काम करे के तरीका देख के अचरज होथे कि जब मामला बड़े मनखे मन के आथे, त अदालत ह कतका 'फुरती' देखाथे। यूजीसी (UGC) वाले मामला म जइसन याचिका लगिस अउ मिनट घला नहीं, बल्कि सेकंड म रोक (Stay) के फैसला आगे, देख के अइसे लगथे कि कानून के चक्का म रसूखदार मन बर ग्रीस लगे हे। आम आदमी सोंचथे कि काश! अइसने फुरती हमर घर-बारी, हक-अधिकार अउ रोजी-रोटी के मामला म घलो देखाय जातिस।

​आज के जुग म 'तारीख ऊपर तारीख' के मार सिरिफ गरीब अउ कमजोर मनखे मन सहत हें। एक कोती बड़े मनखे मन बर अदालत ह संझा-रतिहा घलो खुल जथे, अउ दूसर कोती एक गरीब ह न्याय के आस म कचहरी के सीढ़ी चढ़त-चढ़त बुढ़ा जथे। ये बड़ भारी विडंबना आय कि जेकर हाथ म ताकत हे, ओकर बर न्याय ह बुलेट ट्रेन बन जथे, अउ जेकर हाथ खाली हे, ओकर मामला ह फाइलों के बोझा के नीचे दबे रहि जथे। अइसन लागथे कि न्याय के देवी के आंखी म पट्टी ह अमीर-गरीब के भेद मिटाय बर नहीं, बल्कि गरीब के आंसू ल न देखे बर बंधाय हे।

​यूजीसी सामान्य वर्ग बनाम SC/ST/OBC के मामला म जब फैसला ह झट ले आ जथे, त समाज म ये संदेश जथे कि व्यवस्था ह कतका 'एकतरफा' हो सकत हे। जब घलो आरक्षण या वंचित वर्ग के अधिकार के गोठ आथे, त दुनिया भर के नियम-कानून अउ पेंच फंसा दे जाथे। अइसे लगथे कि न्यायपालिका घलो कहुं न कहुं उही मन के पक्ष म खड़े हो जथे जे मन पहिली ले मजबूत हें। सामान्य वर्ग के हित म जउन तेजी दिखाय जाथे, ओकर आधा घलो तेजी यदि शोषित वर्ग के न्याय बर दिखाय जाइतिस, त आज देश के तस्वीर कुछु अउ होतिस।

​अदालत मन के ये 'फुरसतिया अउ फुरती' वाला व्यवहार ह आम आदमी के भरोसा ल डगमगा देथे। लोकतन्त्र म अदालत ल आखिरी उम्मीद माने जाथे, पर जब न्याय ह सिरिफ बड़े मनखे मन के 'विशेषाधिकार' बन जाय, त आम मनखे जाय त कहां जाय? न्याय के दरवाजा ह सबके बर एक बरोबर खुलना चाही। गरीब आदमी त अदालत के नाव सुन के डररा जथे, काबर कि ओकर तीर न त बड़े वकील मन ल दे बर पइसा हे अउ न ही ओकर पहुंच उहां तक हे जिहां ले फैसला 'सेकंड' म आ जथे।

​आखिर म, ये बड़े चिंतन के बात हे कि का हमर न्याय व्यवस्था ह सिरिफ ताकतवर मन के रखवारी बर हे? यदि यूजीसी जइसन मामला म सेकंड म निर्णय आ सकत हे, त उही तेजी हमर गांव-गरीब अउ किसान के मामला म काबर नइ दिखय? जब तक न्याय के गति ह मनखे के 'पहुंच' देख के तय होही, तब तक सामाजिक बराबरी के गोठ सिरिफ भासन तक सीमित रहि जाही। न्याय ह ओला घलो मिलना चाही जेकर आवाज दबाय जावत हे, तबले सही म हमर संविधान ह सफल माना जाही।

यूजीसी (UGC) के जउन कानून ऊपर रोक लगाय गे हे, ओला असल म अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) अउ पिछड़ा वर्ग (OBC) के हित ल देख के बनाय गे रहिस, ताकि उच्च शिक्षा अउ भर्ती म वंचित वर्ग मन ल उंकर जायज हक मिल सके। लेकिन जइसनहे ये कानून ह जमीन म उतरे के तइयारी म रहिस, सामान्य वर्ग के लोगन मन ह अदालत के सरन ले लिन अउ तुरंत रोक (Stay) लगवा दे हिन। अचम्भा के बात ये हे कि ये मुद्दा म भाजपा के भीतर घलो बगावत के सुर तेज हो गे हे। विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल, अउ शिवसेना जइसन संगठन, जेन मन ल अक्सर 'सवर्ण समाज' के हितैषी माने जाथे, उमन घलो खुल के भाजपा सरकार के विरोध म उतर आय हें। उंकर कहना हे कि सरकार के अइसन कानून ले सवर्ण समाज के हक मारा जावत हे। ये स्थिति ह साफ देखाथे कि जब भी पिछड़ा अउ शोषित वर्ग ल आगे बढ़ाए के कानूनी कोसिस होथे, त कइसे ताकतवर संगठन अउ सवर्ण समाज ह लामबंद हो के ओला रोके के जतन करथे, चाहे ओकर बर अपन ही सरकार के विरोध काबर न करे बर पड़े।


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